321 साल पहले, आज ही के दिन जन्में थे भारत में “जाट साम्राज्य के प्लूटो”, जानिए कितने शक्तिशाली थे-

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रोहित चौधरी।

जाट साम्राज्य के प्लूटो और हमारे मस्तिष्क में निवास करने वाले हिन्दू धर्म रक्षक अजेय महाराजा सूरजमल की जयंती है।इस अवसर पर उन सभी को जो हमारे इतिहास में रूचि रखते हैं सादर अवलोकन के लिए आज महाराजा सूरजमल यानि हिंदुस्तान के एक मात्र अविजित महाराजा का 311 वा जन्मदिवस है।

महाराजा सूरजमल त्याग, बलिदान ,वीरता कि साक्षात् मूर्ति है। इसलिए उनके जन्मदिवस को शोर्य दिवस के रूप में मनाना चाहिए ।जब सम्पूर्ण भारत के राजा राज्य करने के लिए मुगलो को अपनी बहिन बेटी दे रहे थे।

उस समय महाराज ने अपनी वीरता से अपने राज्य का न केवल विस्तार किया बल्कि मुगलो को अपने आगे घुटने टेक ने को मजबूर कर दिया। मुगलो से दिल्ली जीतने वाले एक मात्र हिन्दू राजा थे । उनके खौफ के कारन ही मुगलो ने अपने राज्य में पीपल के पेड़ को काटने और गाय कि हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था।
सूरज सा दिलेर उस समय कोई नहीं था।

महाराजा सूरजमल का जन्म उस दौर में हुआ जब हिन्द देश औरंगज़ेब के अत्याचार से पीड़ित था। यह वो दौर था जब सनातन धर्म के बच्चे नित्य मारे जाते थे जबरन लड़कियों को उठा लिया जाता था तब ब्रज की पावन भूमि पर माँ देवकी की कोख से 13 फरवरी 1707 में एक सूरज का जन्म हुआ जो हिन्द देश का इतिहास वीरता और बलिदान से लिखने वाला था।

इस बच्चे के बचपन का नाम सुजान सिंह रखा गया जो अपने तेज रोबीले व्यक्तित्व के कारण सूरजमल्ल नाम से प्रसिद्ध हुए।उनके जन्म के संबंध में जन मानस में एक लोकगीत प्रचलित है।
‘आखा’ गढ गोमुखी बाजी । माँ भई देख मुख राजी ।।
धन्य धन्य गंगिया माजी । जिन जायो सूरज मल गाजी ।।
भइयन को राख्यो राजी । चाकी चहुं दिस नौबत बाजी ।।

भरतपुर इतिहास के अनुसार सूरजमल महाराजा बदन सिंह के ही पुत्र थे, जबकि कुछ इतिहासकार उनको दत्तक पुत्र मानते है।

महाराजा बदनसिंह के 26 पुत्र थे ऐसे में उनको किसी को गोद लेने कि क्या जररूत थी। सूरजमल कि माँ कामा कि जाटणी थी।

बदनसिंह के 26 पुत्र निम्न थे सूरजमल, प्रतापसिंह, अखैसिंह, बलराम सिंह ,बिजयसिंह ,बीरनारायण सिंह, दलेल सिंह , दुल्हसिंह , देवीसिंह , गुमानसिंह, हिम्मत सिंह, जोध सिंह, कुशालसिंह ,खेमकरण सिंह, लालसिंह, मानसिंह, मेघ सिंह ,उदयसिंह, सुलतानसिंह ,सुखरामसिंह ,साकत सिंह ,सभाराम सिंह ,रामकृष्ण सिंह , रामबल सिंह ,रामप्रेमसिंह
महाराजा सूरजमल का वास्तविक नाम सुजानसिंह था।

महाराजा सूरजमल के 14 रानियाँ और 5 लड़के थे उनकी रानियों में किशोरी देवी ,हसिया रानी। गौरी देवी ,ख़त्तुदेवी कल्याणी देवी ,गंगा देवी मुख्य है , उनके पुत्र जवाहर सिंह ,रणजीतसिंह ,रतन सिंह , नाहरसिंह ,नवल सिंह थे
मानवेन्द्र सिंह तोमर महाराजा सूरजमल की रियासत का नक़्शा राजस्थान सरकार सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित बुक सुजस के पेज 1160 के अनुसार उनकी रियासत में आगरा ,अलीगढ,मथुरा,हाथरस, मेरठ ,बागपत ,एटा ,बुलंदशहर,फ़िरोज़ाबाद,फर्रुखाबाद,हापुड़ जिले हरयाणा के पलवल, मेवात, फरीदाबाद, महेंद्रगढ़,गुड़गांव, रोहतक, रेवाड़ी, झज्जर राजस्थान के भरतपुर अलवर, करौली जिले का हिंडौन दौसा जिले का महुवा क्षेत्र आता था।

मुगलो में सूरजमल के ख़ौफ़ के कारन यह कहावत प्रचलित हुई

तीर चले तलवार चले चाहे इशारे से,

पर अल्लाह अबकी बार बचाये जाट भरतपुर वारे से।

महाराजा सूरजमल के बारे में कुछ इतिहासकारो के कथन-

बूंदी रियासत के महाकवि ने महाराजा सूरजमल के बारे में एक बार यह दोहा गाया था –

सहयो भले ही जटनी जाय अरिष्ट अरिष्ट!
जापर तस रविमल्ल हुवे आमेरन को इष्ट!!
अर्थात् जाटनी की प्रसव पीड़ा बेकार नहीं गई, उसने ऐसे प्रतापी राजा तक को जन्म दिया जिसने आमेर व जयपुर वालों की भी रक्षा की
(यह बात महाराजा सूरजमल के बारे में कही गई थी जब उन्होंने आमेर व जयपुर राजपूत राजाओं की रक्षा की)।

इतिहासकार डॉ० जे. एन. सरकार ने सूरजमल के बारे में लिखा है- यह जाटवंश का अफलातून राजा था।

इतिहासकार डी.सी. वर्मा:- महाराजा सूरजमल जाटों के प्लेटो थे।

बादशाह आलमगीर द्वितीय ने महाराजा सूरजमल के बारे में अब्दाली को लिखा था – जाट जाति जो भारत में रहती है, वह और उसका राजा इतना शक्तिशाली हो गया है कि उसकी खुली खुलती है और बंधी बंधती है।

महाराजा सूरजमल ने अपने जीवन में बहुत से युद्ध लड़े और जीते युद्धो के दोरान दुश्मन को नरक का रास्ता उनकी तलवार ने दिखाया।

चन्दौस का युद्ध 1746,बगरू का युद्ध 20 अगस्त 1748 को जयपुर रियासत के दो भाइयो के बीच था जहा माधोसिंह के साथ सम्पूर्ण राजपूत और मराठा शक्ति थी वही ईश्वर सिंह के साथ जाट वीर सूरजमल थे सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार ले कर लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा तब सूर्यमल्ल मिश्रण ने जवाब दिया यह वीर लोहागढ़ का जाट वीर है और आगे का परिचय एक इस प्रकार दिया

“नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर
जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर”
इस युद्ध में सुरजमल ने सम्पूर्ण राजपूत शक्ति को एक साथ पराजित किया।

1जनवरी 1750को मीर बक्शी ने सूरजमल से समझोता कियाउनके राज्य में न पीपल कटा गयेगा नहीं गाय हत्या होगी और न किसी मंदिर को नुकसान होगा।

उस समय उनका खौफ था जो मुस्लिम इस बात को मानने के लिए मजबूर हुए जिसको आज तक कोई दूसरा भी नहीं मनवाया पाया।
घासेड़ा का युद्ध 1753में हुआ
दिल्ली विजय 10 मई 1753।

मुगलो से ब्राह्मण कन्या को बचाना –

जब दिल्ली पर मुग़ल वंश के बादशाह का राज्य था उनके दरबार में रामजीलाल ब्राह्मण नौकरी करता था एक दिन रामजीलाल मिश्रा की लड़की चन्दन अपने पिता को खाना देने आई बादशाह की कुदृष्टि चन्दन पर पड़ गयी बादशाह ने रामजीलाल से चन्दन की माँग की परेशान पिता ने यह बात अपनी पुत्री और पत्नी को बताई पर धर्मपरायण पुत्री ने मुगलानी बनने से मना कर दिया बादशाह ने चन्दन को जेल में डाल कर उसके सामने मौत और निकाह में से एक को चुनने को कुछ समय दिया दुःखी चन्दन ने जेल की सफाई करने वाली जमादारणी से पूछा क्या इस हिन्द में ऐसा कोई राजा नहीं जो हिन्दू की इस बेटी की लाज इज्जत बचा सके सफाई करने वाली स्त्री ने कहा ऐसा राजा लोहागढ़ के सूरजमल है ।

चन्दन ने अपनी माँ को राजा से मदत का सन्देश सफाई करने वाली के माध्यम से भेजा चंदन की माँ सूरजमल के दरबारमें मदत की गुहार की सूरजमल ने अपना दूत वीरपाल गुर्जर को बादशाह के दरबार में भेजा बादशाह ने वीरपाल गुर्जर से युद्ध को कहा वीरपाल मुग़ल सैनिको से लड़ते हुए मारे गए।

महाराजा सूरजमल ने चौक हवेली में पंचायत की उसके बाद 60 हज़ार सैनिको के साथ दिल्ली कूच किया महाराज सूरजमल की सेना ने दिल्ली में प्रवेश किया दिल्ली जीत ली गयी 2 दिन तक दिल्ली में मुगलो को लूटा गया और एक शाम अकेले घूमते हुए रुहलो ने सूरजमल के ज़हर बुझा तीर मार दिया उनकी मृत्यु हो गयी उसके बाद रानी किशोरी के निमंत्रण पर उनके ज्येष्ठ पुत्र जवाहर सिंह ने दिल्ली पर विजय प्राप्त की ।

चन्दन कौर को मुक्त करवा लिया गया दिल्ली विजय की निशानी लाल किले के फाटक, नूरजहाँ का झूला बहुत से अमूल्य मुग़ल चीज़े भरतपुर में आज भी मौजूद है यह लाल किले के वो ही फाटक है जिनको चित्तौड़गढ़ से जीत के मुस्लिम दिल्ली ले गए थे।मुगलो में सूरजमल के ख़ौफ़ के कारन यह कहावत प्रचलित हुई

तीर चले तलवार चले चाहे इशारे से,

पर अल्लाह अबकी बार बचाये जाट भरतपुर वारे से।

इस सम्पूर्ण घटना क्रम को ऑडियो कैसेट के रूप में ब्रज के लोक कलाकार हरीराम गुर्जर ने प्रस्तुत किया है।

2.- जब महाराज सूरजमल ने दिल्ली के मुस्लिम बख्शी सलामत खान को मेवात के युद्ध में 1 जनवरी 1750 को हरा दिया। सलामत खान मेवात में जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहा था। हारे सलामत खान से सूरजमल निम्न शर्तें रखीं और मीरबख्शी ने इन्हें स्वीकार कर लिया –

(1) मीरबख्शी का कोई भी व्यक्ति उनके प्रदेश में पीपल का वृक्ष नहीं काटेगा।

(2) इस क्षेत्र के किसी भी मन्दिर का अपमान नहीं किया जायेगा और न हिन्दुओं की उपासना के सम्बन्ध में किसी तरह की आपत्ति की जायेगी।

3.- जब अहमद शाह नाम के नरपिशाच हिन्दुओ का नरसंहार करते हुए मथुरा की और आगे बढ़ा तो उसको सूरजमल ने बल्लबगढ़ और मथुरा के चोमुहा में चुनोती थी। अब्दाली के साथ युद्ध में 5000 सैनिक सूरजमल के शहीद हुए अब्दाली से हज़ारो ब्राह्मण और लडकिया मुक्त करवाई गयी जिनका वर्णन प्रो गेंडासिंह राजपूत न अपनी किताब अहमद शाह अब्दाली में किया है।
-जाटगर्दी

9 मई से 4 जून 1753 के बीच जाटों ने पुरानी दिल्ली को बुरी तरह से लूटा। इसका कारण वज़ीर सफरजंग दुवारा हिन्दू लड़कियो को उठा लेना था। ‘तारीख-ए-अहमदशाही’ के लेखक के कथनानुसार, “जाटों ने दिल्ली के दरवाजों तक लूटपाट की; लाखों-लाख लूटे गये; मकान गिरा दिये गये और सब उपनगरों (पुरों) में, चुरनिया और वकीलपुरा में तो कोई दीया ही नहीं दिखता था।” इसी समय से जाट-गर्दी (जाटों की लूट) शब्द प्रचलन में आया।

महाराजा सूरजमल दिल्ली से लाखों रुपये की सम्पत्ति के साथ एक संगमरमर का झूला भी लाया था जो डीग के मुख्य महल ‘गोपाल भवन’ के सामने रखा हुआ है।

(देखो, बदनसिंह के भवनों का निर्माण, प्रकरण)।
कवि सूदन लिखता है –

देस देस तजि लच्छिमी दिल्ली कियौ निवास।

अति अधर्म लखि लूट मिस चली करन ब्रजवास॥

(सुजान चरित्र, पृ० 179)
पानीपत के तीसरे युद्ध 14 जनवरी 1761 में जब मराठे युद्ध हार गए तब अब्दाली के डर से किसी राजा ने मदत नहीं की ऐसे में घायल मराठो को अपने दुर्ग में सूरजमल ने शरण दी। पेशवा बाजीराव का पुत्र शमशेर बहादुर घायल अवस्था में डीग पहुंचा था। सूरजमल ने उसका बहुत उपचार कराया किन्तु वह बच नहीं सका। जाट राजा ने बयाना में उसका मकबरा बनवाया।

(भाऊ बखर, पृ० 162; काशीराज, पृ० 50; मीरात-ए-अहमदी, पृ० 917)।
वंश भास्कर, पृ० 3696 पर लिखा है कि

“पराजय सम्मुख जानकर होल्कर अपनी दस हज़ार सेना के साथ रणक्षेत्र से निकलकर सुरक्षित जाट प्रदेश भरतपुर में आ गया।”
सर देसाई, पानीपत, पृ० 193 पर लिखते हैं कि दिल्ली का वजीर एवं राज्यपाल नरोशंकर और बालाजी पालान्दे दिल्ली, से 3, 4 हजार सैनिकों के साथ भाग निकले। मार्ग में उन्हें मल्हार राव होल्कर अपने 8-10 हजार सैनिकों के साथ मिला। भरतपुर में महाराजा सूरजमल ने उन्हें पूरी सुरक्षा, सुख तथा हर प्रकार की सहूलियतें प्रदान कीं। वे वहां 15-20 दिन ठहरे। महाराजा ने उनका अत्यधिक सम्मान करते हुए दोनों हाथ जोड़कर कहा, “मैं तुम्हारे परिवार का ही एक पुराना सेवक हूँ,यह राज्य तुम्हारा ही है।” ऐसे व्यक्ति बिरले ही मिलते हैं। उसने अपने सरदारों को उनकी सुरक्षार्थ ग्वालियर तक साथ भेजा। नाना फड़नवीस ने एक पत्र में लिखा था – “सूरजमल के व्यवहार से पेशवा के चित्त को बड़ी सांत्वना मिली।”

ग्रांड डफ ने मराठे शरणार्थियों के साथ सूरजमल के बर्ताव के बारे में लिखा है – जो भी भगोड़े उसके राज्य में आये, उसके साथ सूरजमल ने अत्यन्त दयालुता का व्यवहार किया यदि सूरजमल भाऊ द्वारा उसके साथ किए गए दुर्व्यवहार को भूलकर संकट की इस घड़ी में मराठों की सहायता न करता, तो गिनती के लोग ही पेशवा को पानीपत की दुखान्तिका सुनाने नर्मदा पार पहुंच पाते। परन्तु उसने विजेता एवं शक्तिशाली अब्दाली की शत्रुता का खतरा उठाकर भी हिन्दू धर्म एवं मानवीय व्यवहार का परिचय दिया। उसकी इस विशाल हृदयता की सभी समकालीन फारसी एवं मराठा लेखकों ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है।

!! (भाऊ बखर, पृ० 161-162; भाऊ कैफियत पृ० 27-28; पुरन्दरे दफ्तर, 1, पत्र 417; काशीराज, पृ० 50-51; नूरूद्दीन, पृ० 51ब; इमाद, पृ० 203; बयान-ए-वाक़या, पृ० 293)!!

अंत में महाराजा सूरजमल के सम्मान में बलवीर घिंटाला की कलम से-

56 वसंत की आयु में भी, वह शेरों से खुला भिड़ जाता था,

जंगी मैदानों में तलवारों से, वैरी मस्तक उड़ा जाता था,

वीरों की सदा यह पहचान रही है, रणसमर में देते बलिदान है,

इस सूरज ने वही इतिहास रचा, शत शत तुम्हें प्रणाम है,

अमर हो गया जाटों का सूरज, दे गया गौरवगान हमें,

कर गया इतिहास उज्ज्वल, दे गया इक अभिमान हमें,

“नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर।

जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर।।”

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