मोदी-शाह की जोड़ी कर्नाटक के बाद राजस्थान में यह करेगी बड़ा खेल?

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रोहित चौधरी।

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कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा जनता दल सेकुलर के साथ मिलकर जितने भी नाटक करने थे, कर लिए, लेकिन आखिर ताज भाजपा ने ही पहना है। कर्नाटक चुनाव के दौरान दिल्ली में कांग्रेस द्वारा जन आक्रोश रैली आयोजित की गई। रैली को संबोधित किया कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार बैठ गए, फिर दोबारा उठे, उन्होंने अपना हेलीकॉप्टर का किस्सा सुनाया और जनता से 15 दिन की छुट्टियां मांगी। दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इसी दौरान कर्नाटक में जनता से वह वादे किए, जिसे सत्ता हासिल की जा सकती है।

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फर्क साफ है, एक लीडर जनता से छुट्टियां मांगता है और दूसरा लीडर जनता के काम करने की वादे करता है। दोनों का समय एक ही होता है। ऐसे में सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों लीडर्स की लीडरशिप में कितना अंतर है। कर्नाटक चुनाव हो गए, परिणाम भी आ गया, लेकिन इस दरमियान राहुल गांधी कहां है? इस बात का सार्वजनिक रूप से किसी को पता नहीं है! दूसरी तरफ कर्नाटक चुनाव होने के बाद और परिणाम आने से पहले तक अमित शाह ने दिल्ली में बैठकर वह रणनीति बनाई, जिससे कर्नाटक में बहुमत हासिल नहीं होने के उपरांत उपजने वाली परिस्थितियों से कैसे निपटा जा सकता है? इस रणनीति का परिणाम आज साफ तौर पर देखने को मिला है?

1 दिन पहले परिणाम आने के बाद कांग्रेस ने अपना आखिरी और सबसे बड़ा दांव खेला जनता दल सेकुलर को बाहर से बिना शर्त समर्थन देकर एच डी देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया। यह लालच कोई भी पार्टी उस स्थिति में नहीं छोड़ सकती थी, जिस स्थिति में जनता दल सेकुलर है। केवल 37 विधायकों के साथ यदि कोई पार्टी सत्ता में आ जाए। उसके सामने 105 विधायकों वाली पार्टी सत्ता से बाहर बैठने को विवश हो जाए, इससे बढ़िया मौका कुमारस्वामी और एच डी देवेगौड़ा के पास नहीं था। दोनों ने कांग्रेस के इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया और राज्यपाल के पास पहुंच गए, लेकिन अब राजनीति में मर्यादाओं की बातें करना और मर्यादाओं को लागू करना केवल अफवाह और गलतफहमी पालने के सिवा कुछ भी नहीं है।

कर्नाटक के खेल पर आज राज्यपाल ने अपना निर्णय सुनाकर फुल स्टॉप लगा दिया। कल बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे और सरकार का गठन हो जाएगा। 15 दिन का समय दिया गया है, यह 15 दिन का समय क्यों दिया गया है और उसका औचित्य क्या है, यह आम आदमी की समझ से परे है? लेकिन क्योंकि यह राज्यपाल का अधिकार है, तो कोई उंगली भी नहीं उठा सकता। हालांकि, कांग्रेस पार्टी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की चर्चा कर रही है, किंतु संवैधानिक जानकारों के अनुसार जब राज्यपाल किसी सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर देता है, तो शपथ ग्रहण और बहुमत साबित करने तक कोर्ट सामान्यता मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है! इसलिए कांग्रेस का यह दांव यहीं पर फेल हो जाता है।

अब हम बात करते हैं नवंबर में होने वाले 3 राज्यों के विधानसभा चुनाव की। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान काफी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं, वहां पर कांग्रेस आज की तारीख में बहुमत हासिल करती नजर नहीं आ रही है। छत्तीसगढ़ में भी कमोबेश यही स्थिति है। हालांकि, राजस्थान में बीते जनवरी माह में आए परिणाम के दौरान BJP ने उपचुनाव में तीनों सीटें गंवाई, लेकिन जिस तरह से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसको “वेकअप कॉल” करार दिया और उसके बाद मैदान में उतर गईं, इससे साफ जाहिर है कि राजे किसी भी स्थिति में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से मात खाने के मूड में नहीं हैं।

राजस्थान कांग्रेस में इन दिनों बड़े नेता एक दूसरे के खिलाफ बयान बाजी करने में और दूसरों के बयानों को काटने में लगे हुए हैं, वहीं बीजेपी की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष नहीं होने के बावजूद मुख्यमंत्री राजस्थान के दौरे पर निकली हुईं हैं, और जनता की नब्ज टटोली रही हैं। जनता से सीधा संवाद कर रहीं हैं। एक तरह से देखा जाए तो मुख्यमंत्री पूरी तरह से विधानसभा चुनाव में कूद चुकीं हैं। इसके बाद करीब 3 महीने बाद, यानी जब बीजेपी आलाकमान राजस्थान में अपने दोनों कदमों के साथ मैदान में उतरेगी, तो कांग्रेस की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है?

गुजरात और कर्नाटक दोनों राज्यों में BJP ने किनारे पर जाकर सरकार बनाई है। राजस्थान में उपचुनाव होने तक BJP को बेहद बुरी स्थिति में माना गया, क्योंकि तमाम 17 सीटों पर BJP हारी। लेकिन जिस तरह से BJP समीकरण बदलने में कामयाब रहती है, जिस तरह से मोदी और शाह की जोड़ी हर चुनाव में अपनी जबरदस्त रणनीति के साथ उतरते हुए कांग्रेस को मात देती है, आसानी से समझा जा सकता है कि राजस्थान में भी बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी! यहां भी कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में आने से वंचित हो जाएगी।

भारत की राजनीति में यह सर्वविदित सत्य हो चुका है, कि वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के मुकाबले सियासत में दूसरी कोई जोड़ी नहीं है, जो रणनीति के मामले में हर दांव पेच को अपने हिसाब से खेल जाती है और विपक्ष को ठिकाने लगाने में कामयाब हो जाती है। इन दोनों दिग्गज नेताओं की रणनीति को लेकर कांग्रेस अब तक कोई तोड़ नहीं निकाल पाई है, दूसरी पार्टियां तो सोच भी नहीं पा रही है कि वह इस जोड़ी का तोड़ कैसे निकाले और सियासत में फिर से अपने पैर किस तरह जमाए जा सके?

बहरहाल इतना ही कहा जा सकता है, कि साल 2014 से लेकर अब तक अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी जिस तरह से सियासी पासे फेंकते हुए लगभग पूरे भारत पर बीजेपी को काबिज कर दिया है, उससे इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि नवंबर में होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भी जीत हासिल कर बीजेपी फिर से सत्तारूढ़ होने में कामयाब हो जाएगी।

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