देश को सुंदरता का 17 साल बाद गौरव दिलाया ‘मानुषी’ ने

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दिव्या छिल्लर, झज्जर।

हरियाणा वैसे तो कुश्ती, मुक्केबाजी और कबड्डी जैसे खेलों के लिए जाना जाता रहा है। देश की सीमा पर भी हरियाणा के जाट काफी आगे रहते हैं। वैसे हरियाणा—पंजाब एक ही है। राज्य अलग हैं, लेकिन दोनों की सामाजिक रीति—नीति करीब करीब एक ही हैं।

खेलों में औसतन हर दिन हरियाणे का एक जाट खिलाड़ी नाम कमाता है। लेकिन देश में सुंदरता का सूखा खत्म करने के लिए भी कोई जाट ही आगे आएगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। जहां कि बोली में अखड्पन हो, वहां से सुंदरी निकलना वैसे ही टेढी खीर है।

मानुषी छिल्लर ने इस सूखे और मिथक को तोड़ दिया। हालांकि मानुषी हमेशा से अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ी हैं, लेकिन हरियाणे में कहावत है कि ‘अनपढ़ जाट पढ़े बराबर, अर पढ़ जाए तो भगवान बराबर’। ऐसे में कहा जा सकता है कि हरियाणे की लड़कियां क्या कर सकती है।

किसी के लिए यकीन करना उतना ही मुश्किल है, जितना भारत का कभी विश्वकप जीतना था। 2000 में प्रिंयका चौपड़ा ने यह खिलाब जीता था। उसके बाद कई बार संभावनाएं प्रबल हुई, लेकिन हर बा​र विफलता हाथ लगी। इस बार हरियाणा ने इस विफलता को पछ़ाड दिया। उसी स्टाइल में जिस तरह से हरियाणे के पहलवान कुश्ती में विरोध को पस्त कर देते हैं। देखने में तो मानुषी सुंरद हैं ही, साथ दिमागी रूप से भी काफी सुंदर विचार रखती हैं।

दो सवालों के उत्तरों ने ज्यूरी को खिताब देने पर मजबूर कर दिया। पहला तब था, जब अंतिम 30 सुंदरियां थीं। पूछा: इस एक माह में क्या सीखने को मिला? मानुषी बोलीं: यही कि मैं दुनिया बदल सकती हूं। दूसरा सवाल तब था, जब आखिरी मौका था। पूछा: सबसे ज्यादा तनख्वाह किसकी होनी चाहिए? तो इसपर मानुषी ने भारत की सोच के अनुसार कहा: मां की। लेकिन पैसे में नहीं, प्यार में, सम्मान में और अपनेपन में।

इन दो सवालों ने मानुषी के दिमाग की खूबसूरती को दिखा दिया। हमेशा कहा जाता है कि स्वस्था शरीर में ही स्वस्थ दिमागा का निवास होता है, लेकिन मानुषी ने इसमें यह भी जोड़ दिया कि कभी कभी सुंदर चेहरे के पीछे सुंदर सोच भी होती है।

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