…’लाल किला’ इसलिए दिया गया है डालमिया को लीज पर!

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नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा भारत की ऐतिहासिक इमारत लाल किले को डालमिया ग्रुप को लीज पर दिए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस बीच हमने आपको वह तस्वीर दिखाने का प्रयास किया है, जिसके चलते यह विवाद उठ रहा है। क्या है लाल किला का इतिहास? क्या है इसमें खूबियां और क्यों दुनिया भर में इस को इज्जत की नजर से देखा जाता है? आइए आपको बताते हैं पूरी कहानी-

लाल क़िला, दिल्ली के ऐतिहासिक, क़िलेबंद, पुरानी दिल्ली के इलाके में स्थित, लाल रेत-पत्थर से निर्मित है। इस किले को पांचवे मुग़ल बाद्शाह शाहजहां ने बनवाया था। इस के किले को “लाल किला”, इसकी दीवारों के लाल रंग के कारण कहा जाता है। यहीं से हर साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारत के प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं। इस ऐतिहासिक किले को वर्ष 2007 में यूनेस्को द्वारा एक विस्व धरोहर स्थल चयनित किया गया था।

लाल किला एवं शाहजहाँनाबाद का शहर, मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा 1639 में बनवाया गया था। लाल किले का बाद में अभिन्यास फिर से किया गया था, जिससे इसे सलीमगढ़ किले के संग एकीकृत किया जा सके। यह किला एवं महल शाहजहाँनाबाद की मध्यकालीन नगरी का महत्वपूर्ण केन्द्र-बिन्दु रहा है। लालकिले की योजना, व्यवस्था एवं सौन्दर्य मुगल सृजनात्मकता का शिरोबिन्दु है, जो कि शाहजहाँ के काल में अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची। हालांकि यह भी कहा जाता है कि इसका निर्माण उससे कई वर्षों पूर्व हो चुका था। इस किले के निर्माण के बाद कई विकास कार्य स्वयं शाहजहाँ द्वारा किए गए।

विकास के कई बड़े पहलू औरंगजेब एवं अंतिम मुगल शासकों द्वारा किये गये। सम्पूर्ण विन्यास में कई मूलभूत बदलाव ब्रिटिश काल मे 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद किये गये थे। ब्रिटिश काल में यह किला मुख्यतः अंग्रेजी हुकूमत की सेना की छावनी रूप में प्रयोग किया गया था। बल्कि स्वतंत्रता के बाद भी इसके कई महत्वपूर्ण भाग सेना के नियंत्रण में 2003 तक रहे।

लाल किला मुगल बादशाह शाहजहाँ की नई राजधानी शाहजहाँनाबाद का महज़ एक महल था। यह दिल्ली शहर की सातवीं मुस्लिम नगरी थी। उसने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली बदला, अपने शासन की प्रतिष्ठा बढ़ाने, साथ ही अपनी नये-नये निर्माण कराने की महत्वकाँक्षा को नए मौके देने के लिए भी, इसमें उस मुगल शासक की मुख्य रुचि भी थी।

यह किला भी ताजमहल और आगरे के किले की भांति ही यमुना नदी के किनारे पर स्थित है। यमुना नदी का जल इस किले को घेरकर खाई को भरता था। इसके पूर्वोत्तरी ओर की दीवार एक पुराने किले से लगी थी, जिसे सलीमगढ़ का किला भी कहते हैं। सलीमगढ़ का किला इस्लाम शाह सूरी ने 1546 में बनवाया था। लालकिले का निर्माण 1638 में आरम्भ होकर 1648 में पूर्ण हुआ। पर कुछ मतों के अनुसार इसे लालकोट का एक पुरातन किला एवं नगरी बताते हैं, जिसे शाहजहाँ ने कब्जा़ करके यह किला बनवाया था। लालकोट राजा पृथ्वीराज चौहान ( यह राजा अजमेर का पृथ्वीराज चौहान नहीं होकर, दिल्ली का जाट राजा पृथ्वीराज चौहान था) की बारहवीं सदी के अन्तिम दौर में राजधानी थी।

11 मार्च 1783 को, सिखों ने लालकिले में प्रवेश कर दीवान-ए-आम पर कब्जा़ कर लिया। सिखों ने मुगलों की सेना को बुरी तरह परास्त कर यहां से भगा दिया था। नगर को मुगल वजी़रों ने अपने सिख साथियों का समर्पण कर दिया। यह कार्य करोर सिंहिया मिस्ल के सरदार बघेल सिंह धालीवाल के कमान में हुआ।

लालकिला सलीमगढ़ के पूर्वी छोर पर स्थित है। इसको अपना नाम लाल बलुआ पत्थर की प्राचीर एवं दीवार के कारण मिला है। यही इसकी चार दीवारी बनाती है। यह दीवार 1.5 मील (2.5 किमी) लम्बी है और नदी के किनारे से इसकी ऊँचाई 60 फीट (16मी), तथा 110 फीट (35 मी) ऊँची शहर की ओर से है। इसके नाप जोख करने पर ज्ञात हुआ है, कि इसकी योजना एक 82 मी की वर्गाकार ग्रिड (चौखाने) का प्रयोग कर बनाई गई है। इसके निर्माण की शैली बताती है कि यह कहीं से भी मुगल काल का ऐतिहासिक भवन नहीं है, बल्कि भारत के पौराणिक राजाओं की भांति बनाया गया इमारत का एक सुंदर महल है।

लाल किले की योजना पूर्ण रूप से की गई थी और इसके बाद के बदलावों ने भी इसकी योजना के मूलरूप में कोई बदलाव नहीं होने दिया है। कहा जाता है कि जाट राजा पृथ्वीराज चौहान द्वारा बनाया गया यह भव्य किला बाद में मुगलों के हाथों में चला गया और मुगल काल के ह्रास के समय 18वीं सदी में कुछ लुटेरों एवं आक्रमणकारियों द्वारा इसके कई भागों को क्षति पहुँचाई गई थी। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद किले को ब्रिटिश सेना के मुख्यालय के रूप में प्रयोग किया जाने लगा था। इस सेना ने इसके करीब 80 प्रतिशत मण्डपों तथा उद्यानों को नष्ट कर दिया। इन नष्ट हुए बागों एवं बचे भागों को पुनर्स्थापित करने की योजना सन 1903 में उमैद दानिश द्वारा चलाई गई।

लाल किले में उच्चस्तर की कला एवं विभूषक कार्य दृश्य है, जो भारतीय कला का सुंदरतम नमूना है। यहाँ की कलाकृतियाँ फारसी, यूरोपीय एवं भारतीय कला का संश्लेषण है, जिसका परिणाम विशिष्ट एवं अनुपम शाहजहानी शैली था। यह शैली रंग, अभिव्यंजना एवं रूप में उत्कृष्ट है। लालकिला दिल्ली की एक महत्वपूर्ण इमारत समूह है, जो भारतीय इतिहास एवं उसकी कलाओं को अपने में समेटे हुए हैं। इसका महत्व समय की सीमाओं से बढ़कर है। यह वास्तुकला सम्बंधी प्रतिभा एवं शक्ति का प्रतीक है। सन 1913 में इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक घोषित होने से पूर्व इसकी उत्तरकालीनता को संरक्षित एवं परिरक्षित करने के प्रयास हुए थे।

इसकी दीवारें, काफी सुचिक्कनता से तराशी गईं हैं। ये दीवारें दो मुख्य द्वारों पर खुली हैं ― दिल्ली दरवाजा एवं लाहौर दरवाजा। लाहौर दरवाज़े इसका मुख्य प्रवेशद्वार है। इसके अन्दर एक लम्बा बाजार है, चट्टा चौक, जिसकी दीवारें दुकानों से कतारित हैं। इसके बाद एक बडा़ खुला स्थान है, जहाँ यह लम्बी उत्तर-दक्षिण सड़क को काटती है। यही सड़क पहले किले को सैनिक एवं नागरिक महलों के भागों में बांटती थी। इस सड़क का दक्षिणी छोर दिल्ली गेट पर है। कहा जाता है कि इसके निर्माता शासक पृथ्वीराज चौहान ने ही इसको देश दुनिया में बेहतरीन भवन बनाने का सपना देखा था।

नक्करख़ाना

लाहौर गेट से चट्टा चौक तक आने वाली सड़क से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना बना है। यह संगीतज्ञों हेतु बने महल का मुख्य द्वार है। मुगल शासकों द्वारा इस को परिवर्तित करवाया गया था नाम भी तभी बदले गए थे।

दीवान-ए-आम

इस गेट के पार एक और खुला मैदान है, जो कि मुलतः दीवाने-ए-आम का प्रांगण हुआ करता था। दीवान-ए-आम। यह जनसाधारण हेतु बना वृहत प्रांगण था। एक अलंकृत सिंहासन का छज्जा, दीवान की पूर्वी दीवार के बीचों बीच बना था। यह बादशाह के लिये बना था और सुलेमान के राज सिंहासन की नकल ही था।

नहर-ए-बहिश्त

राजगद्दी के पीछे की ओर शाही निजी कक्ष स्थापित हैं। इस क्षेत्र में, पूर्वी छोर पर ऊँचे चबूतरों पर बने गुम्बददार इमारतों की कतार है, जिनसे यमुना नदी का किनारा दिखाई पड़ता है। ये मण्डप एक छोटी नहर से जुडे़ हैं, जिसे नहर-ए-बहिश्त कहते हैं, जो सभी कक्षों के मध्य से जाती है। किले के पूर्वोत्तर छोर पर बने शाह बुर्ज पर यमुना से पानी चढा़या जाता है, जहाँ से इस नहर को जल आपूर्ति होती है। इस किले का परिरूप कुरान में वर्णित स्वर्ग या जन्नत के अनुसार बना है। यहाँ लिखी एक आयत कहती है,

ज़नाना

महल के दो दक्षिणवर्ती प्रासाद महिलाओं हेतु बने हैं, जिन्हें जनाना कहते हैं: मुमताज महल, जो अब संग्रहालय बना हुआ है, एवं रंग महल, जिसमें सुवर्ण मण्डित नक्काशीकृत छतें एवं संगमर्मर सरोवर बने हैं, जिसमें नहर-ए-बहिश्त से जल आता है। महलों का निर्माण भी खुद पृथ्वीराज चौहान द्वारा अपनी रानियों के रहने के लिए किया गया बताया जाता है।

खास महल

दक्षिण से तीसरा मण्डप है खास महल। इसमें शाही कक्ष बने हैं। इनमें राजसी शयन-कक्ष, प्रार्थना-कक्ष, एक बरामदा और मुसम्मन बुर्ज बने हैं। इस बुर्ज से बादशाह जनता को दर्शन देते थे। इतिहास में यह भी उल्लेख है कि पृथ्वीराज यहीं से जनता को संबोधित करते थे।

दीवान-ए-ख़ास

दीवान-ए-खास, राजसी निजी सभा कक्ष

अगला मण्डप है दीवान-ए-खास, जो राजा का मुक्तहस्त से सुसज्जित निजी सभा कक्ष था। यह सचिवीय एवं मंत्रीमण्डल तथा सभासदों से बैठकों के काम आता थाइस म्ण्डप में पीट्रा ड्यूरा से पुष्पीय आकृति से मण्डित स्तंभ बने हैं। इनमें सुवर्ण पर्त भी मढी है, तथा बहुमूल्य रत्न जडे़ हैं। इसकी मूल छत को रोगन की गई काष्ठ निर्मित छत से बदल दिया गया है। इसमें अब रजत पर सुवर्ण मण्डन किया गया है।

अगला मण्डप है, हमाम, जो कि राजसी स्नानागार था, एवं तुर्की शैली में बना है। इसमें संगमर्मर में मुगल अलंकरण एवं रंगीन पाषाण भी जडे़ हैं, जो भारतीय शैली से मेल खाते हैं।

मोती मस्जिद

हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद बनी है। यह सन् 1659 में, बाद में बनाई गई थी, जो औरंगजेब की निजी मस्जिद थी। यह मस्जिद बनावट में आज भी एक ही वाले की आंखें नजर आती है। यह एक छोटी तीन गुम्बद वाली, तराशे हुए श्वेत संगमर्मर से निर्मित है। इसका मुख्य फलक तीन मेहराबों से युक्त है, एवं आंगन में उतरता है। जहां फुलो का मेला है

हयात बख़्श बाग

इसके उत्तर में एक वृहत औपचारिक उद्यान है, जिसे हयात बख्श बाग कहते हैं। इसका अर्थ है जीवन दायी उद्यान। किसी भी तरह के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए इसका निर्माण किया गया था। यह दो कुल्याओं द्वारा द्विभाजित है। एक मण्डप उत्तर दक्षिण कुल्या के दोनों छोरों पर स्थित हैं एवं एक तीसरा बाद में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा 1842 बनवाया गया था। यह दोनों कुल्याओं के मिलन स्थल के केन्द्र में बना है।

लाल किला दिल्ली शहर का सर्वाधिक प्रख्यात पर्यटन स्थल है, जो लाखॉ पर्यटकों को प्रतिवर्ष आकर्षित करता है। यह किला वह स्थल भी है, जहाँ से भारत के प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को देश की जनता को सम्बोधित करते हैं। यह दिल्ली का सबसे बडा़ स्मारक भी है।

एक समय था, जब 3000 लोग इस इमारत समूह में रहा करते थे। परंतु 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद किले पर ब्रिटिश सेना का कब्जा़ हो गया, एवं कई रिहायशी महल नष्ट कर दिये गये। इसे ब्रिटिश सेना का मुख्यालय भी बनाया गया। इसी संग्राम के एकदम बाद बहादुर शाह जफर पर यहीं मुकदमा भी चला था। यहीं पर नवंबर 1945 में इण्डियन नेशनल आर्मी के तीन अफसरों का कोर्ट मार्शल किया गया था। यह स्वतंत्रता के बाद 1947 में हुआ था। इसके बाद भारतीय सेना ने इस किले का नियंत्रण ले लिया था। बाद में दिसम्बर 2003 में, भारतीय सेना ने इसे भारतीय पर्यटन प्राधिकारियों को सौंप दिया।

इस किले पर दिसम्बर 2000 में लश्कर-ए-तोएबा के आतंकवादियों द्वारा हमला भी हुआ था। इसमें दो सैनिक एवं एक नागरिक मृत्यु को प्राप्त हुए। इसे मीडिया द्वारा काश्मीर में भारत – पाकिस्तान शांति प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास बताया गया था।

1947 में भारत के आजाद होने पर ब्रिटिश सरकार ने यह परिसर भारतीय सेना के हवाले कर दिया था, तब से यहां सेना का कार्यालय बना हुआ था। 22 दिसम्बर 2003 को भारतीय सेना ने 56 साल पुराने अपने कार्यालय को हटाकर लाल किला खाली किया और एक समारोह में पर्यटन विभाग को सौंप दिया। इस समारोह में रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने कहा था कि सशस्त्र सेनाओं का इतिहास लाल किले से जुड़ा हुआ है, पर अब हमारे इतिहास और विरासत के एक पहलू को दुनिया को दिखाने का समय है।

मुगल शासक शाहजहां ने 1638 में लाल किले के निर्माण के आदेश दिये थे। लगभग इसी समय उसने आगरा में अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद में ताजमहल बनवाना शुरू किया था। लाल किले पर 1739 में फारस के बादशाह नादिर शाह ने हमला किया था और वह अपने साथ यहां से स्वर्ण मयूर सिंहासन ले गया था, जो बाद में ईरानी शहंशाहों का प्रतीक बना। 1857 के गदर के बाद ब्रिटिश सेना ने लाल किले पर नियंत्रण कर लिया।

क्यों दिया सरकार ने डालमिया को लीज पर

खबरों के मुताबिक डालमिया भारत प्राइवेट लिमिटेड को भारत सरकार ने लीज पर दे दिया है। इसकी समस्त देखरेख डालमिया ग्रुप द्वारा की जाएगी साथ ही इसके पेटे हर साल कम से कम 25 करोड़ पर खर्च किए जाएंगे। इस ऐतिहासिक इमारत पर लगातार हो रहे प्राकृतिक हम लोगों के चलते रखरखाव में संकट आ रहा था। इसी तरह की अन्य इमारतों को भी सरकार ने बड़ी कंपनियों को रखरखाव के लिए गोद लेने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि विपक्ष की तरफ से इसको सरकार द्वारा भेजा हुआ बताया जाकर प्रसारित किया जा रहा है, लेकिन इसमें सत्यता नहीं है।

सरकार ने कहा है कि इस ऐतिहासिक इमारत को किसी भी निजी हाथ में नहीं सौंपा गया है। बल्कि इसके रखरखाव के लिए डालमिया ग्रुप ने गोद लिया है। जो एक सुनिश्चित समय के लिए होगा। सरकार को लगेगा कि अब इसको वापस लिया जाना चाहिए तो ग्रुप को बाहर कर दिया जाएगा। साथ ही साथ सरकार ने यह भी कहा है कि डालमिया ग्रुप इसमें व्यवसाय गतिविधि नहीं करेगा और लाभ के लिए कोई भी काम नहीं करेगा।

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