यह है जाटों का असल इतिहास, जो इतिहासकारों ने लिखा ही नहीं!

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नई दिल्ली।
देश की एक महान जाती का इतिहास लिखा ही नहीं गया। यदि इतिहास को ईमानदारी से लिखा जाता तो जाट जाती के बिना भारत, पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान सहित कई देशों के इतिहास की किताबों में जाटों का ही गुणगान होगा। एक कहावत है कि ‘अंग्रेजों के राज में उनका सूर्यास्त नहीं हुआ करता था’। यह सच है कि उनके अधीन आने वाले देशों में हमेशा कहीं ना कहीं दिन रहता था। इतिहास में अंग्रेजों के खिलाफ महज प्लासी की लड़ाई का उल्लेख किया गया है, जबकि यह लड़ाई कभी लड़ी ही नहीं गई। इस लड़ाई के बीच में ही लेन-देन शुरू हो गया था। आजादी के लिए सन् 1857 के गदर का इतिहास तो पूरा ही मंगल पाण्डे, नाना साहिब, टीपू सुलतान, तात्या टोपे तथा रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर घुमाकर छोड़ा गया है। किन्तु जब जाटों का नाम आता है और उनकी बहादुरी की बात आई तो साम्यवादी और ब्राह्मणवादी लेखकों की कलम की स्याही सूख गई, जो अब तक सूखी हुई है। इससे पहले 1805 में भरतपुर के महाराजा रणजीतसिंह पुत्र महाराजा सूरजमल की चार महीने तक अंग्रेजों के साथ जो लड़ाई चली, वह अपने आप में जाटों की बहादुरी की मिशाल और भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय रहा है। भारत में अंग्रेजों और भरतपुर के जाट राजा के बीच समानता के आधार पर सन्धि करना एक ऐतिहासिक गौरवशाली दस्तावेज है जिसे ‘Permanent
Friendship Treaty on Equality Basis’ नाम दिया गया था। यही एकमात्र सन्धि है जो अंग्रेजों ने भारत में किसी राजा से की थी। अंग्रेजों को दूसरों के साथ सन्धि करने की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि इतिहास में कथित रूप से बहादुर कहे जाने वाले राजाओं ने अंग्रेजों की बगैर किसी लड़ाई लड़े गुलामी स्वीकार कर ली थी। इतिहास गवाह है कि भारत के किसी भी अन्य राजा ने अंग्रेजों के खिलाफ प्लासी युद्ध व मराठों के संघर्ष को छोड़कर अपनी तलवार नहीं निकाली। बहादुरी की डींग हाकने वालों ने नीची गर्दन करके अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार की थी। पंजाब में जब तक ‘पंजाब केसरी’ महाराजा रणजीतसिंह जीवित थे (सन् 1839), अंग्रेजों ने कभी पंजाब की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं की। सन् 1845 में उन्होंने पंजाब में प्रवेश किया, वह भी लड़ाई लड़कर ही। अंग्रेज इन लड़ाइयों के अन्त में विजयी रहे, लेकिन कुछ हिन्दुओं की महान् गद्दारी की वजह से (आगे पढें)। भरतपुर की महान लड़ाई को लेकर एक दोहा प्रचलित था-

हुई मसल मशहूर विश्व में, आठ फिरंगी नौ गोरे।
लड़ें किले की दीवारों पर, खड़े जाट के दो छोरे।

इस लड़ाई का विवरण बहुत पुस्तकों में लिखा मिलता है। ‘भारत में अंग्रेजी राज’, ‘जाटों के जोहर’ और ‘भारतवर्ष में अंग्रेजी राज के 200 वर्ष जैसी किताबें इस बात को पुख्ता करती हैं।’ एक इतिहासकार विद्वान् सवाराम सरदेसाई की पुस्तक ‘अजय भरतपुर’ प्रमुख है। विद्वान् आचार्य गोपालप्रसाद ने तो पूरा इतिहास पद्यरूप में गाया है जिसका प्रारंभ इस प्रकार है-

अड़ कुटिल कुलिस-सा प्रबल प्रखर अंग्रेजों की छाती में गढ़,
सर-गढ़ से बढ़-चढ़ सुदृढ़, यह अजय भरतपुर लोहगढ़।

यह दुर्ग भरतपुर अजय खड़ा भारत माँ का अभिमान लिए,
बलिवेदी पर बलिदान लिए, शूरों की सच्ची शान लिए ॥

जब राजस्थान के राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के विरोध में तलवार
नहीं उठाई तो जोधपुर के राजकवि बांकीदास से नहीं रहा गया और उन्होंने ऐसे गाया

पूरा जोधड़, उदैपुर, जैपुर, पहूँ थारा खूटा परियाणा।
कायरता से गई आवसी नहीं बाकें आसल किया बखाणा ॥

बजियाँ भलो भरतपुर वालो, गाजै गरज धरज नभ भौम।
पैलां सिर साहब रो पडि़यो, भड उभै नह दीन्हीं भौम ॥

अर्थ है कि “है जोधपुर, उदयपुर और जयपुर के मालिको ! तुम्हारा तो वंश ही खत्म हो गया, कायरता से गई भूमि कभी वापिस नहीं आएगी। बांकीदास ने यह सच्चाई वर्णन की है। भरतपुर वाला जाट तो खूब लड़ा, तोपें गरजीं, जिनकी धूम आकाश और पृथ्वी पर छाई रही। अंग्रेजों का सिर काट डाला, लेकिन खड़े-खड़े अपनी भूमि नहीं दी।”

अंग्रेजों ने खुद अपनी किताबों और अनेकानेक लेखों में भरतपुर की लड़ाई पर जाटों की बहादुरी पर अनेक टिप्पणियां लिखीं हैं। जनरल लेक ने वेलेजली (इंग्लैंड) को 7 मार्च 1805 को पत्र लिखा “मैं चाहता हूं कि भरतपुर का युद्ध बंद कर दिया जाये, इस युद्ध को मामूली समझने में हमने भारी भूल की है।” इस कारण भरतपुर का लोहगढ़ का किला हमेशा अजयगढ़ कहलाया। उस समय कहावत चली थी लेडी अंग्रेजन रोवें कलकत्ते में, क्योंकि अंग्रेज भरतपुर की लड़ाई में मर रहे थे, लेकिन उनके परिवार राजधानी कलकत्ता में रो रहे थे। इतिहास गवाह है कि जाटों ने चार महीने तक अंग्रेजों के आंसुओं का पानी कलकत्ता की हुगली नदी के पानी में मिला दिया था। स्वयं राजस्थान इतिहास के रचयिता कर्नल टाड ने लिखा – अंग्रेज लड़ाई में जाटों को कभी नहीं जीत पाए।

इस प्रकार अंग्रेजों का सूर्य जो भारत में बंगाल से उदय हो चुका था भरतपुर, आगरा व मथुरा में उदय होने के लिए चार महीने इंतजार करता रहा, फिर भी इसकी किरणें पंजाब में 41 साल बाद पहुंच पाईं। भारतवर्ष में केवल जाटों की दो रियासतों, भरतपुर व धौलपुर ने कभी भी अंग्रेजों को खिराज (टैक्स) नहीं दिया। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि भरतपुर में लौहगढ़ का किला भारत में एकमात्र ऐसा गढ़ है जिसे कभी कोई दूसरा कब्जा नहीं कर पाया। इसलिए इसका नाम अजयगढ़ पड़ा। भरतपुर के महाराजा कृष्णसिंह ने भारतवर्ष में भरतपुर शहर में सबसे पहले नगरपालिका की स्थापना की थी। अंग्रेजों ने मद्रास, कलकता व बम्बई में सबसे पहले मुनिस्पल कार्पोरेशन की स्थापना की। इसी जाट राजा कृष्ण सिंह ने भरतपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन करवाया सन् 1925 में राजाजी ने पुष्कर (राजस्थान) में जाट महासम्मेलन करवाया। जहां चौधरी छोटूराम भी आये थे। इन्होंने जनता के लिए ‘भारत वीर’ नाम का पत्र प्रकाशित करवाया था। यह सभी तथ्य डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार ने अपनी पुस्तक ‘जाटों का नया इतिहास’ में इन्हें संजोया है।

जाटों के विषय में की गई महापुरुषों टिप्पणियाँ

1. यात्री अल बेरूनी इतिहासकार- मथुरा में वासुदेव से कंस की बहन से कृष्ण का जन्म हुआ। यह परिवार जाट था और गाय पालने का कार्य करता था।

2. इतिहासकार डॉ. रणजीतसिंह- जाट तो उन योद्धाओं के वंशज हैं, जो एक हाथ में रोटी और दूसरे हाथ में शत्रु का खून से सना हुआ मुण्ड थामते रहे।

3. इतिहासकार डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार- आज जाटों का दुर्भाग्य है कि सारे संसार की संस्कृति को झकझोर कर देने वाले जाट आज अपनी ही संस्कृति को भूल रहे हैं ।

4. इतिहासकार डॉ. गिरीशचन्द्र द्विवेदी- मेरा निष्कर्ष है कि जाट संभवतः प्राचीन सिंध तथा पंजाब के वैदिक वंशज प्रसिद्ध लोकतान्त्रिक लोगों की संतान हैं । ये लोग महाभारत के युद्ध में भी विख्यात थे और आज भी हैं ।

5. स्वामी दयानन्द महाराज आर्यसमाज के संस्थापक ने जाट को जाट देवता कहकर अपनेप्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश में सम्बोधन किया है। देवता का अर्थ है देनेवाला। उन्होंने कहा कि संसार में जाट जैसे पुरुष हों तो ठग रोने लगजाएं।

6. प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ तथा हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस के संस्थापक महामहिममदन मोहन मालवीय ने कहा- जाट जाति हमारे राष्ट्र की रीढ़ है। भारत माता को इस वीरजाति से बड़ी आशाएं हैं। भारत का भविष्य जाट जाति पर निर्भर है।

7. दीनबन्धु सर छोटूराम ने कहा- हे ईश्वर, जब भी कभी मुझे दोबारा से इंसान जाति में जन्म दे तो मुझे इसी महान् जाट जाति के जाट के घर जन्म देना।

8. कर्नल जेम्स टॉड राजस्थान इतिहास के रचयिता। (i): उत्तरी भारत में आज जो जाट किसान खेती करते पाये जाते हैं। ये उन्हीं जाटों के वंशज हैं जिन्होंने एक समय मध्य एशिया और यूरोप को हिलाकर रख दिया था। (ii):राजस्थान में राजपूतों का राज आने से पहले जाटों का राज था। (iii): युद्ध के मैदान में जाटों को अंग्रेज पराजित नहीं कर सके। (iv): ईसा से500 वर्ष पूर्व जाटों के नेता ओडिन ने स्कैण्डेनेविया में प्रवेश किया। (v): एक समय राजपूत जाटों को खिराज (टैक्स) देते थे।

9.यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस ने लिखा है (i) There was no nation in the world equal to the jats in bravery provided they had unity. इसका अर्थ है- संसार में जाटों जैसा बहादुर कोई नहीं, बशर्ते इनमें एकता हो। यह इस प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार ने लगभग 2500 वर्ष पूर्व में कहा था। इन दो लाइनों में बहुत कुछ है। पाठक कृपया इसे फिर एक बार पढें। यह जाटों के लिए मूलमंत्र भी है। (ii) जाट बहादुर रानी तोमरिश ने प्रशिया के महान राजा सायरस को धूल चटाई थी। (iii) जाटों ने कभी निहत्थों पर वार नहीं किया।

10. महान् सम्राट् सिकन्दर जब जाटों के बार-बार आक्रमणों से तंग आकर वापिस लौटने लगा तो कहा- इन खतरनाक जाटों से बचो।

11. हमलावर तैमूरलंग ने कहा – जाट एक बहुत ही ताकतवर जाति है, शत्रु पर टिड्डियों की तरह टूट पड़ती है, इन्होंने मुसलमानों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया।

12. हमलावर अहमदशाह अब्दाली ने कहा- जितनी बार मैंने भारत पर आक्रमण किया,पंजाब में खतरनाक जाटों ने मेरा मुकाबला किया। आगरा, मथुरा व भरतपुर के जाट तो नुकीले काटों की तरह हैं।

13. एक प्रसिद्ध अंग्रेज मि. नेशफील्ड ने कहा- जाट एक बुद्धिमान् और ईमानदार जाति है।

14. इतिहासकार सी.वी. वैद ने लिखा है- जाट जाति ने अपनी लड़ाकू प्रवृत्ति को अभी तक कायम रखा है। जाटों को इस प्रवृत्ति को छोड़ना भी नहीं चाहिए, यही भविष्य में बुरे वक्त में काम भी आयेगी।

15. भारतीय इतिहासकार शिवदास गुप्ता- जाटों ने तिब्बत, यूनान, अरब, ईरान, तुर्कीस्तान, जर्मनी, साईबेरिया, स्कैण्डिनोविया, इंग्लैंड, ग्रीक, रोम व मिश्र आदि में कुशलता, दृढ़ता और साहस के साथ राज किया। और वहां की भूमि को विकासवादी उत्पादन के योग्य बनाया था। (प्राचीन भारत के उपनिवेश पत्रिका अंक 4.5 1976)

16. हर्षि पाणिनि के धातुपाठ (अष्टाध्यायी) में- जट झट संघाते- अर्थात् जाट जल्दी से संघ बनाते हैं। (प्राचीनकाल में खेती व लड़ाई का कार्य अकेले व्यक्ति का कार्य नहीं था। इसलिए यह जाटों का एक स्वाभाविक गुण बन गया -लेखक)

17. महर्षि यास्क-निरुक्त में- जागर्ति इति जाट्यम्- जो जागरूक होते हैं वे जाट कहलाते हैं। जटायते इति जाट्यम्- जो जटांए रखते हैं वे जाट कहलाते हैं।

18. दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार पर जर्मन जनरल रोमेल ने कहा- काश, जाट सेना मेरे साथ होती। (वैसे जाट उनके साथ भी थे, लेकिन सहयोगी देशों की सेना की तुलना में बहुत कम थे- लेखक)

19. सुप्रसिद्ध अंग्रेज योद्धा जनरल एफ.एस. यांग- जाट सच्चे क्षत्रिय हैं। ये बहादुरी के साथ-साथ सच्चे, ईमानदार और बात के धनी हैं।

20. महाराजा कृष्णसिंह भरतपुर नरेश ने सन् 1925 में पुष्कर में कहा- मुझे इस बात पर अभिमान है कि मेरा जन्म संसार की एक महान् और बहादुर जाति में हुआ।

21. महाराजा उदयभानुसिंह धोलपुर नरेश ने सन् 1930 में कहा- मुझे पूरा अभिमान है कि मेरा जन्म उस महान् जाट जाति में हुआ जो सदा बहादुर, उन्नत एवं उदार विचारों वाली है। मैं अपनी प्यारी जाति की जितनी भी सेवा करूंगा उतना ही मुझे सच्चा आनन्द आयेगा।

22. डॉ. विटरेशन ने कहा- जाटों में चालाकी और धूर्तता, योग्यता की अपेक्षा बहुत कम होती है।

23. मेजर जनरल सर जॉन स्टॉन (मणिपुर रजिडेंट) ने अपने एक जाट रक्षक के बारे में कहा था- ये जाट लोग पता नहीं किस मिट्टी से बने हैं, थकना तो जानते ही नहीं।

24. अंग्रेज हर प्रकार की कोशिशों के बावजूद चार महीने लड़ाई लड़कर भी भरतपुर को विजय नहीं कर पाये तो लार्ड लेकेक ने लिखा है- हमारी स्थिति यह है कि मार करने वाली सभी तोपें बेकार हो गई हैं और भारी गोलियां पूर्णतः समाप्त हो गई हैं। हमारे एक तिहाई अधिकारी व सैनिक मारे जा चुके हैं। जाटों को जीतना असम्भव लगता है। उस समय वहां की जनता में यह दोहा गाया जाता था- यही भरतपुर दुर्ग है, दूसह दीह भयंकार| जहां जटन के छोकरे, दीह सुभट पछार||

25. बूंदी रियासत के महाकवि ने महाराजा सूरजमल के बारे में एक बार यह दोहा गाया था- सहयो भले ही जटनी जाय अरिष्ट अरिष्ट| जापर तस रविमल्ल हुवे आमेरन को इष्ट||अर्थात् जाटनी की प्रसव पीड़ा बेकार नहीं गई, उसने ऐसे प्रतापी राजा तक को जन्म दिया, जिसने आमेर व जयपुर वालों की भी रक्षा की (यह बात महाराजा सूरजमल के बारे में कही गई थी, जब उन्होंने आमेर व जयपुर राजपूत राजाओं की रक्षा की)।

26. इतिहासकार डॉ. जे. एन. सरकार ने सूरजमल के बारे में लिखा है- यह जाटवंश का अफलातून राजा था।

27. इतिहासकार डी.सी. वर्मा- महाराजा सूरजमल जाटों के प्लेटो थे।

28. बादशाह आलमगीर द्वितीय ने महाराजा सूरजमल के बारे में अब्दाली को लिखा था- जाट जाति जो भारत में रहती है, वह और उसका राजा इतना शक्तिशाली हो गया है कि उसकी खुली खुलती है और बंधी बंधती है।

29. कर्नल अल्कोट- हमें यह कहने का अधिकार है कि 4000 ईसा पूर्व भारत से आने वाले जाटों ने ही मिश्र (इजिप्ट) का निर्माण किया।

30. यूरोपीयन इतिहासकार मि. टसीटस ने लिखा है- जर्मन लोगों को प्रातः उठकर स्नान करने की आदत जाटों ने डाली। घोड़ों की पूजा भी जाटों ने स्थानीय जर्मन लोगों को सिखलाई। घोड़ों की सवारी जाटों की मनपसंद सवारी है।

31. तैमूर लंग- घोड़े के बगैर जाट, बगैर शक्ति का हो जाता है। (हमें याद है आज से लगभग 50 वर्ष पहले तक हर गांव में अनेक घोडे, घोड़ियां जाटों के घरों में होती थीं। अब भी पंजाब व हरयाणा में जाटों के अपने घोड़े पालने के फार्म हैं- लेखक)

32. भारतीय सेना के ले. जनरल के. पी. कैण्डेय ने सन् 1971 के युद्ध के बाद कहा था- अगर जाट न होते तो फाजिल्का का भारत के मानचित्र में नामोनिशान न रहता।

33. इसी लड़ाई (सन् 1971) के बाद एक पाकिस्तानी मेजर जनरल ने कहा था- चौथी जाट बटालियन का आक्रमण भयंकर था जिसे रोकना उसकी सेना के बस की बात नहीं रही। (पूर्व कप्तान हवासिंह डागर गांव कमोद जिला भिवानी (हरयाणा) जो 4 बटालियन की इस लड़ाई में थे, ने बतलाया कि लड़ाई से पहले बटालियन कमाण्डर ने भरतपुर के जाटों का इतिहास दोहराया था जिसमें जाट मुगलों का सिहांसन और लाल किले के किवाड़ तक उखाड़ ले गये थे। पाकिस्तानी अफसर मेजर जनरल मुकीम खान पाकिस्तानी दसवें डिवीजन के कमांडर थे ।)

34. भूतपूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने जाट सेण्टर बरेली में भाषण दिया- जाटों का इतिहास भारत का इतिहास है और जाट रेजिमेंट का इतिहास भारतीय सेना का इतिहास है। पश्चिम में फ्रांस से पूर्व में चीन तक ‘जाट बलवान्-जय भगवान’ का रणघोष गूंजता रहा है ।

35. विख्यात पत्रकार खुशवन्त सिंह ने लिखा है- (i) “The Jat was born worker and warrior. He tilled his land with his sword girded round his waist. He fought more battles for the defence for his homestead than other Khashtriyas” इसका अर्थ है जाट जन्म से ही कर्मयोगी तथा लड़ाकू रहा है जो हल चलाते समय अपनी कमर से तलवार बांध कर रखता था। किसी भी अन्य क्षत्रिय से उसने मातृभूमि की ज्यादा रक्षा की है। (ii) पंचायती संस्था जाटों की देन है और हर जाटों का गांव एक छोटा गणतन्त्र है।

36. जब 25 दिसम्बर 1763 को जाट प्रतापी राजा सूरजमल शाहदरा में धोखे से मारे गये तो मुगलों को विश्वास ही नहीं हुआ और बादशाह शाहआलम द्वितीय ने कहा- जाट मरा तब जानिये जब तेरहवीं हो जाये। (यह बात विद्वान् कुर्क ने भी कही थी।)

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