क्या है स्वामीनाथन आयोग और उसकी सिफारिशें, जिनके लिए किसान सड़कों पर हैं?

25

जयपुर।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में किसानों का जोरदार आंदोलन चल रहा है। हालांकि, कल देर शाम महाराष्ट्र सरकार व किसानों के मध्य समझौता हो गया। सरकार ने किसानों की 80 प्रतिशत मांगों को मान लिया गया है, इन मांगों को सदन में रखा जाएगा। मोदी सरकार आने के बाद सबसे पहले तमिलनाडू में ​किसानों ने आंदोलन किया, इसके बाद दिल्ली के जंतर—मंतर पर किसानों ने जोरदार धरना—प्रदर्शन किया।

पिछले साल मध्यप्रदेश में शुरू हुआ उग्र किसान आंदोलन देश के दूसरे राज्यों में भी फैलने लगा तो सरकार के हाथ—पांव फूल गए। राजस्थान के सीकर और प्रतापगढ़ में किसानों ने कर्जमाफी सहित अन्य मांगों को पूरा करने के लिए सरकार को एक मई तक का वक्त दिया है। पंजाब में भी सात बड़े किसान संगठनों ने सरकार को राज्यव्यापी आंदोलन चेतावनी दे रखी है।

उत्तरप्रदेश में कर्जमाफी की घोषणा होने के बाद भी अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के बैनर तले किसान आंदोलन की धमकी दे चुके हैं। हरियाणा में भी किसानों के विरोध की आवाज सुनाई दी। पानीपत में किसान अपनी बीस सूत्रीय मांग को लेकर भारतीय किसान यूनियन के साथ बैठक कर चुके हैं। जबकि अंबाला में तो किसानों ने आंदोलन की शुरूआत की चेतावनी दे डाली है।

इन सभी किसानों की मांग है कि कृषि पर एसएम स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों को लागू किया जाए। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें साल 2006 में आई थीं। साल 2014 की आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था, लेकिन अब एक जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि लागत मूल्य पर 50 फीसदी बढ़ोतरी से मंडी में दिक्कतें आ सकती है। जिसके चलते इसे लागू करना फिलहाल संभव नहीं है। भाजपा की ही हरियाणा सरकार ने तो आयोग की सिफारिशें ही उनके पास होने से इनकार कर दिया है।

अन्नदाता के द्वारा उगाए गए अन्न की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और देश के किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर बनाने को लेकर 2004 में केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया था। किसानों के लाभ और अन्न के उत्पादन बढ़ाने के लिए इस आयोग ने केंद्र सरकार को अपनी पांच रिपोर्टें सौंपी। अंतिम और पांचवीं रिपोर्ट 4 अक्तूबर 2006 में सौंपी गई। रिपोर्ट ‘तेज व ज्यादा समग्र आर्थिक विकास’ के 11वीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य को लेकर बनी थी।

स्वामीनाथन अयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, हर प्रदेश में राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, किसानों की सेहत सुविधाएं बढ़ाने व वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश की गई है, जिससे छोटे व मझौले किसान भी मुकाबले में आएं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सस्ती दरों पर फसली ऋण मिले, मतलब ब्याज़ दर सीधे 4 प्रतिशत कम कर दी जाए। लोन उगाही में किसानों के साथ नरमी बरती जाए, यानि जब तक किसान कर्ज़ चुकाने की स्थिति में न आ जाए तब तक उससे कर्ज़ न वसूला जाए। किसानों को प्राकृतिक आपदाओं में बचाने के लिए कृषि राहत फंड बनाया जाए।

 

ऋण के बोझ तले दबे किसान किस तरह से आत्महत्या करते हैं, इसका एक नमूना देखिए। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की है। 2014 की तुलना में 2015 में किसानों और कृषि मजदूरों की कुल आत्महत्या में दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई। साल 2014 में कुल 12360 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी।

आत्महत्या करने वाले इन 12,602 लोगों में 8,007 किसान थे जबकि 4,595 खेती से जुड़े मजदूर थे। साल 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 और खेती से जुड़े मजदूरों की संख्या 6,710 थी। इन आंकड़ों के अनुसार किसानों की आत्महत्या के मामले में एक साल में 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वहीं कृषि मजदूरों की आत्महत्या की दर में 31.5 फीसदी की कमी आई है।

किसानों के आत्महत्या के मामले में सबसे ज्यादा खराब हालत महाराष्ट्र की रही। राज्य में साल 2015 में 4291 किसानों ने आत्महत्या कर ली। महाराष्ट्र के बाद किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले कर्नाटक (1569), तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) में सामने आए।

Facebook Comments
SHARE