उम्मीदवार तय करने के साथ ही कांग्रेस ने मानसिक रूप से हारी अजमेर की सीट!

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रोहित चौधरी।
पहले कांग्रेस के प्रदेश सेनापति का युद्ध के वक्त मैदान से हटना और उसके बाद अब ऐसे घोड़े पर दांव खेलना, जो पहले से काफी कमजोर और थका—हारा है, साफतौर पर जाहिर करता है कि अजमेर की लोकसभा सीट कांग्रेस पहले ही मानसिक रूप से हार चुकी है। यहां पर बीजेपी की जीत लगभग तय है। अलवर लोकसभा सीट पर जरूर मुकाबला कांटे का हो सकता है, लेकिन यहां पर बीजेपी के लिए मुश्किलें अपने ही खड़ी करेंगे। कभी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के काफी करीबी रहे किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट और बेरोजागारों के लिए चार साल से संघर्षरत राजस्थान बेरोजगार एकीकृत महासंघ के अध्यक्ष उपेन यादव के मैदान में उतरने की घोषणा ने बीजेपी को परेशानी में डाल दिया है।

इस बीच रविवार को बीजेपी ने अपनी ओर से अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर अपने उम्मीदवार तय कर दिये। अजमेर में पूर्व सांसद सांवरलाल जाट के बेटे रामस्वरूप लाम्बा, अलवर से श्रम मंत्री जसंवत सिंह यादव और मांडलगढ़ से शक्ति सिंह हाड़ा को टिकट दिया गया है। कांग्रेस की ओर से अलवर में पूर्व सांसद डॉ. करण सिंह यादव, अजमेर से कैकड़ी से पूर्व विधायक रघु शर्मा को मैदान में उतारा गया है। इसी तरह से मांडलगढ़ से विवेक धाकड़ को अपना उम्मीदवार बनाया है। अलवर में यादव से यादव को लड़ाया गया है। यहां पर यादवों के करीब 3.5 लाख वोटर हैं। इसके साथ ही मेव, ब्राह्मण, जाट, मीणा, गुर्जर जातियां प्रमुख हैं। अजमेर में जाट सबसे अधिक हैं। इसके साथ ही राजपूत, गुर्जर, ब्राह्मण, मूसलमान और सिंधी वोटर हैं। दोनों ही जगह बीजेपी ने सोच—समझकर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

इससे पहले कांग्रेस की ओर से 2014 में लोकसभा चुनाव हार चुके अलवर से भवंर जितेंद्र सिंह और अजमेर से सचिन पायलट मैदान छोड़ चुके हैं। दोनों ने उपचुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। ऐसे में अलवर से कांग्रेस डॉ. यादव पर फिर दांव खेल रही है। जबकि कैकड़ी में 2013 का विधानसभा चुनाव हारने वाले रघु शर्मा को अजमेर को लोकसभा चुनाव टिकट देकर कांग्रेस ने खुद को हारा हुआ स्वीकार कर लिया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कांग्रेस के पास उम्मीदवारों की कमी है।

 

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